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Purushottam Maas Bhoomika
गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानन्द जी महाराज — पुरुषोत्तम मास की महिमा
पुरुषोत्तम मास — भूमिका एवं महिमा
🕉️ Purushottam Maas🙏 Adhik Maas📖 Mahatmya🎧 Pravachan
इस वीडियो में स्वामी जी ने पुरुषोत्तम मास की महिमा, महत्व और साधना का विस्तृत वर्णन किया है। इस पवित्र मास में किए गए जप, तप, दान और सेवा के विशेष फल का सुन्दर निरूपण किया गया है।

In this video, Swamiji has beautifully explained the glory, significance, and spiritual practices of Purushottam Maas in detail. The special benefits of chanting, austerity, charity, and service performed during this sacred month have been wonderfully described.
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Pravachan Video
गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानन्द जी महाराज — प्रवचन
पुरुषोत्तम योग — अध्याय १५ प्रवचन
🕉️ Chapter 15🌳 Ashvattha Tree🙏 Purushottam📖 Gita Pravachan
इस वीडियो में स्वामी जी ने पुरुषोत्तम योग का गहन विवेचन किया है। अध्याय के प्रत्येक श्लोक का उच्चारण है।

“In this video, Swamiji has presented a deep and insightful explanation of Purushottam Yoga. Each verse of the chapter has been recited with proper pronunciation.”
🕉️ पुरुषोत्तम मास पाठ
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श्रीभगवानुवाच
Bhagwan Shri Krishna Speaks —
📖 Language / भाषा :
1
Shloka 1 — Chapter 15
श्लोक 1 — अध्याय पंद्रहवाँ
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
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2
Shloka 2 — Chapter 15
श्लोक 2 — अध्याय पंद्रहवाँ
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥
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3
Shloka 3 — Chapter 15
श्लोक 3 — अध्याय पंद्रहवाँ
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
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4
Shloka 4 — Chapter 15
श्लोक 4 — अध्याय पंद्रहवाँ
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥
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5
Shloka 5 — Chapter 15
श्लोक 5 — अध्याय पंद्रहवाँ
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
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6
Shloka 6 — Chapter 15
श्लोक 6 — अध्याय पंद्रहवाँ
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
✦   ✦   ✦
7
Shloka 7 — Chapter 15
श्लोक 7 — अध्याय पंद्रहवाँ
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
✦   ✦   ✦
8
Shloka 8 — Chapter 15
श्लोक 8 — अध्याय पंद्रहवाँ
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
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9
Shloka 9 — Chapter 15
श्लोक 9 — अध्याय पंद्रहवाँ
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
✦   ✦   ✦
10
Shloka 10 — Chapter 15
श्लोक 10 — अध्याय पंद्रहवाँ
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥
✦   ✦   ✦
11
Shloka 11 — Chapter 15
श्लोक 11 — अध्याय पंद्रहवाँ
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
✦   ✦   ✦
12
Shloka 12 — Chapter 15
श्लोक 12 — अध्याय पंद्रहवाँ
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
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13
Shloka 13 — Chapter 15
श्लोक 13 — अध्याय पंद्रहवाँ
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
✦   ✦   ✦
14
Shloka 14 — Chapter 15
श्लोक 14 — अध्याय पंद्रहवाँ
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
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15
Shloka 15 — Chapter 15
श्लोक 15 — अध्याय पंद्रहवाँ
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
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16
Shloka 16 — Chapter 15
श्लोक 16 — अध्याय पंद्रहवाँ
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥
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17
Shloka 17 — Chapter 15 — Key Verse — Purushottam Introduced
श्लोक 17 — अध्याय पंद्रहवाँ
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
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18
Shloka 18 — Chapter 15 — Key Verse — Purushottam Declaration
श्लोक 18 — अध्याय पंद्रहवाँ
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥
✦   ✦   ✦
19
Shloka 19 — Chapter 15
श्लोक 19 — अध्याय पंद्रहवाँ
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
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20
Shloka 20 — Chapter 15 — Final Verse — Phala Shruti
श्लोक 20 — अध्याय पंद्रहवाँ
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥
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Phala Shruti — फलश्रुति

"न व्रतेन तपोभिर्वा न तीर्थेन च दानतः। यत्फलं लभते जन्तुः पुरुषोत्तमसेवनात्॥"
" जितना फल बड़े-बड़े व्रत, तीर्थ, तपस्या से नहीं मिलता, उतना फल केवल पुरुषोत्तम मास की सेवा से मिल जाता है।"

" The spiritual merit that cannot be attained through even the greatest vows, pilgrimages, and austerities can be easily gained through the observance and devotion of Purushottam Maas."

🌸 पाप-मुक्ति
🕉️ मोक्ष-प्राप्ति
🙏 भक्ति-वृद्धि
💡 ज्ञान-प्राप्ति
🙏
Gita Manishi Swami Gyananand Ji Maharaj
गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानन्द जी महाराज
✦ Param Pujya Gurudev ✦
"पुरुषोत्तम वही है जो क्षर और अक्षर — दोनों से परे है। जब तक हम इस संसार-वृक्ष से आसक्त हैं, तब तक परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं। भगवान की भक्ति ही वह शस्त्र है जो इस मोह-माया के वृक्ष को काट सकती है। श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक एक दिव्य ज्योति है — इसे हृदय में धारण करो।"

“Purushottam is the One who transcends both the perishable and the imperishable. As long as we remain attached to the tree of this worldly existence, realization of the Supreme is not possible. Devotion to God is the only weapon that can cut down this tree of illusion and attachment. Every verse of the Shrimad Bhagavad Gita is a divine light — hold it within your heart.”
— Gita Manishi Swami Shri Gyananand Ji Maharaj
॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
हरि ॐ तत्सत्